शारदीय नवरात्र के चौथे पावन दिवस पर आदिशक्ति मां दुर्गा के कूष्मांडा स्वरूप का अर्चन किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इन्होंने अपनी हल्की मुस्कान से संपूर्ण ब्रह्मांड का सृजन किया था, इसीलिए इन्हें सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है।

पूजन का शुभ काल और समय
पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि 13 अक्टूबर की रात्रि 11:28 से शुरू होकर 15 अक्टूबर की प्रातः 1:13 तक रहेगी। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 4:06 से 4:56 तक निर्धारित है। साथ ही अमृत काल सायं 4:38 से 6:23 तक रहेगा, जबकि अमृत सिद्धि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग प्रातः 5:45 से अगले दिन प्रातः 4:03 तक मान्य है। इस दौरान दोपहर 11:35 से 1:02 तक राहुकाल रहेगा, जिसमें किसी भी नए या शुभ कार्य को न करने की हिदायत दी जाती है।
माता का स्वरूप एवं पसंदीदा वस्तुएं
मां कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है क्योंकि उनके आठ हाथों में अस्त्र-शस्त्र, अमृत कलश, कमंडल, कमल पुष्प और जपमाला सुशोभित हैं तथा उनका वाहन सिंह है। इस आराध्य की पूजा में पीले और हरे वस्त्र पहनना उत्तम माना जाता है। उन्हें पीले गेंदे के साथ पीला कमल प्रिय है और नैवेद्य के रूप में पेठा यानी कुम्हड़ा एवं मालपुआ अर्पित किया जाता है।
पूजन पद्धति और मंत्र जाप
चौथे दिन प्रातःकाल उठकर स्नानादि के उपरांत साफ वस्त्र पहनें और पूजा घर को गंगाजल से पवित्र करें। सर्वप्रथम गणेश जी का स्मरण करके मां कूष्मांडा का ध्यान करें तथा उन्हें अक्षत, सिंदूर, पीले पुष्प, धूप, दीप और हरी इलायची भेंट करें। इसके पश्चात उनके मूल मंत्र ‘ॐ कूष्माण्डायै नमः’ का 108 बार उच्चारण करें। अंत में माता को पेठे या मालपुए का भोग लगाकर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करें।
