शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की विधि-विधान से पूजा की जाती है। माता का यह स्वरूप साहस, शक्ति और शांति का प्रतीक माना जाता है, जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा सुशोभित रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा का यह रूप भक्तों को भय से मुक्ति दिलाने और बुरी शक्तियों से रक्षा करने की प्रेरणा देता है।

मां चंद्रघंटा के दस हाथों के अस्त्र और उनका महत्व
धार्मिक चित्रणों और परंपराओं में मां चंद्रघंटा को दस भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया गया है। उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार, गदा, धनुष, बाण, कमल, कमंडल, घंटा और अन्य दिव्य प्रतीक दिखाई देते हैं। हालांकि, अलग-अलग परंपराओं और चित्रों में इन वस्तुओं का संयोजन थोड़ा भिन्न हो सकता है, इसलिए सभी चित्रों में दसों हाथों की वस्तुएं एक समान होना आवश्यक नहीं माना गया है।
त्रिशूल, तलवार, गदा और धनुष का संदेश
माता के हाथों में सुशोभित त्रिशूल को शक्ति और बुरी शक्तियों के नाश का प्रतीक माना जाता है, जो मनुष्य को अहंकार और नकारात्मकता से लड़ने की प्रेरणा देता है। वहीं, तलवार ज्ञान, विवेक और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का संदेश देती है। इसके साथ ही, गदा साहस और दृढ़ता का प्रतीक है, जबकि धनुष और बाण जीवन में लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने तथा अनुशासन बनाए रखने की सीख देते हैं।
कमल, कमंडल और घंटा का धार्मिक महत्व
मां चंद्रघंटा के अन्य प्रतीकों में कमल पवित्रता और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना गया है, जो कठिन परिस्थितियों में भी मन को स्वच्छ रखने की सीख देता है। कमंडल को तप, संयम और साधना से जोड़ा जाता है, जबकि घंटा देवी की आराधना और जागरूकता को दर्शाता है। मस्तक पर विराजमान अर्धचंद्र शीतलता और मन पर नियंत्रण का भाव प्रकट करता है। पुराणों के अनुसार, देवी के ये अस्त्र-शस्त्र केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि जीवन में संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देते हैं।
