पश्चिम बंगाल की कृष्णनगर संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व करने वाली तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा और नदिया के प्रशासनिक अधिकारियों के मध्य चल रहे गेस्ट हाउस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शुक्रवार को एक अहम फैसला सुनाया गया। अदालत ने निर्देश दिया कि सांसद अपने प्रत्येक निर्धारित दौरे से चौबीस घंटे पूर्व स्थानीय प्रशासन को अवगत कराएं, जिससे सुरक्षा तथा आवास संबंधी प्रबंध नियमों के तहत सुनिश्चित किए जा सकें।

अदालत की टिप्पणी और मानक प्रक्रिया
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने सांसद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई पूरी की, जिसमें एक सितंबर को जारी किए गए विवादास्पद आदेश को चुनौती दी गई थी। विचार-विमर्श के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला न्यायिक हस्तक्षेप योग्य नहीं है, बल्कि इसके समाधान के वास्ते केवल एक साधारण मानक संचालन प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
पक्षकारों की दलीलें और आश्वासन
राज्य सरकार की तरफ से पैरवी करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि किसी भी प्रशासनिक कर्मी द्वारा सांसद को कमरा खाली करने का निर्देश नहीं दिया गया था, और नदिया प्रशासन का पूर्ववर्ती परिपत्र अब अमल में नहीं लाया जाएगा। दूसरी ओर, सांसद की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दावा किया कि यह निर्देश खासतौर पर प्रताड़ित करने की नीयत से लाया गया था, और याद दिलाया कि प्रोटोकॉल क्रम में सांसद का पद मुख्य सचिव से ऊंचा होता है।
घटना की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत अगस्त माह में हुई थी जब सांसद ने शिकायत की थी कि उन्हें वैध रूप से कमरा मिलने के बावजूद गेस्ट हाउस से हटाने का प्रयास हुआ। उनके अनुसार, चौदह अगस्त की रात्रि को जब उन्होंने कमरा छोड़ने से मना किया, तब बाहर लोगों का जमावड़ा लग गया और नारेबाजी की गई। इस पूरे घटनाक्रम की शिकायत उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष भी दर्ज कराई थी।
