बिहार में भ्रष्टाचार के आरोपित लोकसेवकों द्वारा काली कमाई को ठिकाने लगाने के तरीकों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो और आर्थिक अपराध इकाई (इओयू) की हालिया जांच और छापों में यह बात सामने आई है कि अधिकारियों ने अपनी अवैध संपत्ति को केवल बिहार तक सीमित न रखकर पश्चिम बंगाल, सिक्किम और उत्तर प्रदेश तक फैला रखा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, अधिकारियों ने पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहरों में जमीन, फ्लैट, होटल और चाय बागानों जैसे क्षेत्रों में भारी भरकम निवेश किया है।

प्रमुख मामलों में करोड़ों के निवेश का पर्दाफाश
हालिया छापों के दौरान कई अधिकारियों के पास भारी मात्रा में बेनामी संपत्ति और निवेश के दस्तावेज मिले हैं। ग्रामीण कार्य विभाग के कार्यपालक अभियंता चंद्रशेखर सिंह ने अपनी पत्नी के नाम पर सिलीगुड़ी में करोड़ों की जमीन खरीदी है। वहीं, किशनगंज के निलंबित एसडीपीओ गौतम कुमार के मामले में गंगटोक में होटल और सिलीगुड़ी के मिरिक में चाय बागान व बंगला होने के प्रमाण मिले हैं, जिनकी कुल कीमत लगभग 80 करोड़ रुपये आंकी गई है। सुपौल के जिला अवर निबंधक अमरेंद्र कुमार और किशनगंज नगर थाना के इंस्पेक्टर अभिषेक रंजन के ठिकानों पर भी करोड़ों की अवैध संपत्ति और कई शहरों में भूखंड व फ्लैट मिलने की पुष्टि हुई है।
वित्तीय साधनों और अन्य माध्यमों से भी धन जमा
जांच का दायरा केवल जमीन और मकानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि लोकसेवकों ने वित्तीय निवेश के विभिन्न माध्यमों का भी जमकर इस्तेमाल किया है। तलाशी के दौरान म्यूचुअल फंड, भविष्य निधि (पीएफ), बैंक सावधि जमा (एफडी), बीमा पॉलिसियों और भारी मात्रा में सोने के जेवरात के दस्तावेज भी बरामद किए गए हैं। दरभंगा के एक बीडीओ, रोहतास के कार्यपालक अभियंता और अन्य अधिकारियों के मामलों में भी इसी प्रकार के वित्तीय निवेश और बेनामी संपत्तियों के खुलासे हुए हैं, जिनकी अब एजेंसियां गहराई से जांच कर रही हैं।
