दीपावली का पर्व आमतौर पर रोशनी, दीयों और खुशियों का प्रतीक माना जाता है, लेकिन देश के तराई इलाकों में रहने वाली थारू जनजाति इस रात को एक अलग रूप में मनाती है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में फैले इस समुदाय में दीपावली को ‘दिवारी’ कहा जाता है, जहां जश्न की जगह अपने बिछड़े हुए परिजनों की स्मृतियों को ताजा किया जाता है।

थारू समुदाय की अनोखी लोकसंस्कृति
उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर और चंपावत से लेकर उत्तर प्रदेश के पीलीभीत तथा लखीमपुर खीरी तक निवास करने वाली थारू जनजाति की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है। प्राचीन समय में कृषि इस समुदाय की आजीविका का मुख्य साधन हुआ करती थी। कई बार किसी परिजन के निधन के बाद आर्थिक कारणों से परिवार तुरंत सभी धार्मिक रस्में पूरी नहीं कर पाता था, जिसके लिए वे नई धान की फसल कटने और घर में नया अनाज आने का इंतजार करते थे।
दिवंगत परिजनों का बनता है प्रतीकात्मक पुतला
इस परंपरा के तहत परिवार के लोग अपने दिवंगत सदस्य का प्रतीकात्मक पुतला तैयार करते हैं और उनके समक्ष पसंदीदा पकवान रखते हैं। इस दौरान घर के बुजुर्ग पुरानी बातें साझा करते हैं तथा मृतक की आत्मा की शांति के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। कुछ स्थानों पर रातभर रस्में निभाने के बाद सुबह इस पुतले को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है या जला दिया जाता है, जिसे ‘बड़ी रोटी’ जैसी रस्मों से भी जोड़ा जाता है।
बदलाव के साथ कायम है पुरखों की याद
समय के साथ शिक्षा और बदलती जीवनशैली के कारण इस परंपरा की तस्वीर में भी बदलाव आया है। आज कई थारू परिवार अन्य समुदायों की तरह घरों में दीये जलाकर और लक्ष्मी पूजा करके भी दीपावली मनाते हैं। हालांकि, इसके बावजूद पूर्वजों को याद करने और अपनी पुरानी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सिलसिला आज भी कई घरों में जीवंत है।
