भारत में दिवाली का नाम लेते ही मन में दीयों की कतार, रंगोली और मिठाइयों की मिठास की छवि उभर आती है, लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को मनाने के तौर-तरीके बेहद अलग और अनूठे हैं। हर राज्य की अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराएं इस पावन त्योहार को एक नया रंग देती हैं। भगवान की विजय से लेकर पूर्वजों को याद करने और ऐतिहासिक पलों का जश्न मनाने तक, देश भर में दिवाली का स्वरूप अलग नजर आता है।

गोवा में नरकासुर दहन की परंपरा
गोवा में दिवाली का मुख्य आकर्षण नरक चतुर्दशी के अवसर पर होने वाला नरकासुर दहन है। यहाँ पर्व से पहले ही लोग रंग-बिरंगे कागजों और कपड़ों की मदद से असुर नरकासुर के बड़े-बड़े पुतले तैयार करते हैं। नरक चतुर्दशी की सुबह होने से ठीक पहले इन पुतलों को जलाया जाता है। यह परंपरा भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानी जाती है।
पश्चिम बंगाल में भूत चतुर्दशी और 14 दीये
पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात मुख्य रूप से माँ काली की आराधना की जाती है, लेकिन इसके ठीक एक दिन पहले भूत चतुर्दशी मनाने का भी विशेष विधान है। इस अवसर पर बंगाली परिवारों में चौदह दीये जलाने की प्रथा है, जिन्हें परिवार के चौदह पूर्वजों की स्मृति से जोड़ा जाता है। इसके साथ ही घरों में चौदह प्रकार की पत्तेदार सब्जियों से तैयार विशेष व्यंजन का सेवन करने की भी परंपरा है।
ओडिशा में पूर्वजों को याद करने का विधान
ओडिशा में दिवाली के पावन अवसर पर ‘बड़बड़ुआ डाका’ नाम की अनूठी परंपरा का पालन किया जाता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं। इस रस्म में जूट की सूखी डंडियों की सहायता से रोशनी की जाती है, जो पूर्वजों को समर्पित होती है।
पंजाब में बंदी छोड़ दिवस का उल्लास
सिख समुदाय के लिए दिवाली का यह दिन ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में बहुत खास माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर के किले से बावन अन्य राजाओं के साथ मुक्त होकर लौटे थे। इस ऐतिहासिक और खुशी के अवसर पर अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर को भव्य रोशनी से सजाया जाता है और गुरुद्वारों में विशेष कीर्तन व प्रार्थनाओं का आयोजन होता है।
