शारदीय नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कुष्मांडा की विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी ने अपनी हल्की सी मुस्कान से संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की थी।

मां कुष्मांडा के नाम का अर्थ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां कुष्मांडा के नाम का एक विशेष अर्थ है। उनके नाम में ‘कु’ का अर्थ छोटा या सूक्ष्म, ‘उष्मा’ का अर्थ गर्मी या ऊर्जा और ‘अंड’ का संबंध ब्रह्मांड से माना जाता है। इस प्रकार उनके नाम का अर्थ उस शक्ति से है जिससे इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है। इसी वजह से भक्त उन्हें सृष्टि की शुरुआत करने वाली देवी के रूप में पूजते हैं।
मुस्कान से हुई ब्रह्मांड की रचना
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पहले चारों ओर केवल अंधकार था और जीवन का कोई अस्तित्व नहीं था। ऐसे में मां कुष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से इस अंधकार को समाप्त किया और ब्रह्मांड की रचना की। इस रूप का वर्णन मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत देवी महात्म्य और दुर्गा सप्तशती की परंपरा में मिलता है।
सूर्य से जुड़ा है देवी का संबंध
मां कुष्मांडा का संबंध सूर्य देव और उनकी ऊर्जा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी सूर्यलोक में निवास करती हैं और उनके शरीर का तेज सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य को ऊर्जा प्रदान करने की शक्ति भी उन्हीं में निहित है, जिसके चलते उन्हें प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के चौथे दिन उनकी आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और सकारात्मकता का संचार होता है।
