दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से देश में होने वाले बड़े राजनीतिक और सामाजिक विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र रहा है। हालांकि, अब इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है, जिसके बाद प्रदर्शनों के लिए नए स्थान तय किए गए हैं।

खगोलीय गणना से विरोध प्रदर्शनों तक का सफर
अठारहवीं शताब्दी में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने जंतर-मंतर का निर्माण खगोलीय गणनाओं को पूरा करने के लिए करवाया था। लेकिन वर्ष 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बोट क्लब पर हुए भारी किसान आंदोलन के बाद दिल्ली में प्रदर्शन स्थलों की व्यवस्था बदलने लगी। संसद और विभिन्न सरकारी कार्यालयों के नजदीक स्थित होने के कारण जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए एक बेहतर विकल्प माना गया, जिससे यह वर्ष 1993 से आंदोलनों का प्रमुख ठिकाना बन गया।
प्रमुख ऐतिहासिक आंदोलनों का गवाह
बीते तीन दशकों में इस स्थान ने कई बड़े आंदोलनों को देखा है। अप्रैल 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने यहां भ्रष्टाचार और जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी, जिसने देश की राजनीति में एक नया मोड़ दिया और आगे चलकर आम आदमी पार्टी के गठन की नींव रखी। इसके अलावा, वर्ष 2012 के निर्भया मामले के बाद न्याय की मांग, 2014 में नीडो तानिया की मौत पर प्रदर्शन, 2017 में तमिलनाडु के किसानों का लंबा धरना और वर्ष 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध जैसे कई मामले यहां दर्ज किए गए। अप्रैल 2023 में देश के जाने-माने पहलवानों ने भी कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष के खिलाफ इसी स्थल पर धरना दिया था।
अब कहां होंगे प्रदर्शन?
स्थानीय निवासियों की ओर से शोर और गंदगी की शिकायतों के चलते अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने यहां प्रदर्शनों पर रोक लगाने का निर्देश दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा। अंततः दिल्ली पुलिस ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों के आधार पर आदेश जारी कर जंतर-मंतर को आधिकारिक धरना स्थलों की सूची से हटा दिया है। अब प्रदर्शनकारियों के लिए मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तर दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी मैदान निर्धारित किए गए हैं, जिनके लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया लागू की जाएगी।
