मंहगाई के इस दौर में इंसान का जीना ही मुहाल हो गया है. आदमी जैसे-तैसे जुगाड़ कर के अपने बच्चे को अच्छी एजुकेशन दिलाने के लिए बढ़िया स्कूलों में दाखिला कराते हैं. पहले तो इंसान स्कूल में दाखिला कराने के लिए जूझता है और जब दाखिल हो जाता है तो स्कूल मनमनी फीस वसूलते हैं. यही नहीं बच्चों की फैमिली से अलग-अलग तरह के चार्ज के नाम पर पैसे लिए जाते हैं. ऊपर से बच्चों की किताबों का बढ़ता बोझ, बच्चों की ड्रेस के नाम पर पैसे की मनचाही लूट स्कूलों में आम हो चुकी है. एनडीटीवी स्कूल की फीस की फांस के जरिए ऐसे मामलों को सामने ला रहा है, जिससे पैरेंट्स राहत की सांस ले सकें.

स्कूल के मनमानी फीस वसूलने का तर्क

यह तमाम स्कूल जो वसूल रहे हैं, उस पर KRM स्कूल की डायरेक्टर डॉ ज्योति गुप्ता कहती हैं कि ट्रांसपोर्ट फीस शुरू से ही 11 महीने की ली जाती थी और वही ली जानी चाहिए. 12वें महीने जब ट्रांसपोर्ट नहीं चल रहा तो उसकी फीस लेने का कोई मतलब नहीं है. जो भी खर्चा होता है, बसों की जो किश्त जाती है. ड्राइवर और कंडक्टर चाहिए होते हैं. आजकल तो लेडी गार्ड्स भी चाहिए होती है उसके साथ ही मेंटेनेंस भी होती है. बसों की इंश्योरेंस है, इन सबका खर्चा लगाकर ही बसों की फीस तय की जाती है और उसको ग्यारह ही महीने का रखना चाहिए.

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हर साल टीचर्स की सैलरी में 3% का इजाफा

काफी लोगों का यह कहना है कि इंश्योरेंस बारह महीनों की होती है. आप ड्राइवर, कंडक्टर को निकाल नहीं सकते. लेडी गार्ड्स को निकाल नहीं सकते तो उनकी तनख्वाह भी देनी है. दूसरी बात रही डेवलेपमेंट फीस और इन सब फीस का एक फीस रेगुलेशन एक्ट जो है, वह काफी राज्यों में आ गया है. जैसे UP में अभी हमने आपके रिपोर्ट में ही देखा कि DM और जो शिक्षा अधिकारी थे, वह लोग बात कर रहे थे DFRC की. प्री रेगुलेशन एक्ट है, हरियाणा में भी है, UP में भी है, हर स्टेट ने उसको एडॉप्ट किया हुआ है. मैं यह कहूंगी कि हर साल जो फीस बढ़ती है, जो टीचर्स होते हैं उनको 3 फीसदी का इंक्रीमेंट हर साल मिलना होता है.

इसके ऊपर DA आता है तो जो एक फॉर्म्यूला है CPI प्लस 5 पर्सेंट का या कितनी सैलरी टीचर्स की बढ़ी है. उसके हिसाब से बढ़ाना चाहिए. ये जो 20, 21 या 40 फीसदी है. उसके साथ मैं सहमति नहीं रखती. महंगाई भी तो बढ़ रही है. अब हम यह तो नहीं कह सकते कि टीचर्स को सैलरी इंक्रीमेंट नहीं मिलना चाहिए. जो सैलरी में इजाफा मिल रहा है जो DA आ रहा है उसके मुताबिक ही फीस बढ़नी चाहिए.

EWS बच्चों की फीस दूसरों बच्चों से वसूल रहे स्कूल

हर स्कूल को 25 फीसदी EWS भी बच्चों को पढ़ाना होता है. उसकी फीस भी जो है वह इन्हीं बाकि बच्चों के ऊपर बोझ बनती है. क्योंकि सरकार क्या ही देती हैं? ऐसा है कि पहले जो क्लासरूम होते थे तीस बच्चे अगर पेइंग बच्चे होते थे अब जो है वह पच्चीस बच्चे पेइंग बच्चे होते हैं. तो कोई भी स्कूल फीस के मामले में स्थिर नहीं रह सकता उनको कहीं ना कहीं तो अपने ख़र्चे निकालते हैं. टीचर्स तो पूरे तीस बच्चों को पढ़ाएगी.  ज्यादातर स्कूल चार से छह सेक्शन के होते हैं, कुछ इससे ज्यादा है वो चुनिंदा स्कूल होंगे. जिनकी अपनी समस्याएं होगी.

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EWS की फीस दूसरों से वसूलना क्यों गलत, एक्सपर्ट ने बताया

AIPA के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल ने कहा कि  ज्योति ने बहुत भयंकर स्टेटमेंट दे दिया है. उसको देखना पड़ेगा. ज्योति का कहना है कि जो EWS के बच्चे हैं उनका भी खर्चा जो है. हम जो फीस देकर देने वाले पैरेंट्स हैं, उन पर डाल सकते हैं. उनको ये पता नहीं है कि EWS के बच्चे होते हैं, इसके लिए सरकार रीइंबर्समेंट करती है. राइट टू एजुकेशन के अंदर और उसके बाद अगर यह किसी भी तरीके से उससे चार्ज करते हैं या उसके नाम से चार्ज करते हैं तो यह गैरकानूनी है.

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