द्वतीय विश्वयुद्ध के बाद UNO की स्थापना हुई, दुनिया में शांति कायम रखने के लिए और UNO guideline के मुताबिक कोई देश किसी दूसरे देश पर हमला कर देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर दूसरे देश पर कब्जा नही कर सकता। इस बात को सुनिश्चित करने की गारंटी जिन देशों ने ली उनको UNO की सिक्योरिटी काउंसिल की परमानेंट मेंबरशिप मिली. वह देश है अमेरिका, रूस, ब्रिटेन ,चाइना और फ्रांस लेकिन यह भी एक विडंबना है कि जिन देशों ने इस बात की जिम्मेदारी ली वही देश इस गाइडलाइन की धज्जियां उड़ाते नजर आए जैसे चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया और ताइवान पर नजरें गड़ाए बैठा है. रूस अफगानिस्तान में घुस गया और अमेरिका ने वियतनाम,इराक जैसे कई कांड कर चुका है।
यूक्रेन में जब से रूसी सेना ने हमला किया तब से एक बात तो पहले ही दिन से पक्की हो चुकी थी, कि यूक्रेन की हार इस लड़ाई में निश्चित है। अमेरिका और नाटो देशों द्वारा दिए गए धोखे को यूक्रेन समेत पूरी दुनिया ने नसीहत के तौर पर लिया है, लेकिन अब जो विकट स्थिति यूक्रेन के सामने हैं वह यह है की हार के बाद क्या पुतिन यूक्रेन को रूस में मिला लेंगे या यूक्रेन में रूस की कठपुतली सरकार चलेगी जैसा २०१४ से पहले होता था ? और या फिर वहां के आम नागरिक रूस को खदेड़ने के लिए हथियार उठा लेंगे? यूक्रेन के राष्ट्रपति इस लड़ाई को आजादी की लड़ाई का नाम तो दे ही चुके हैं ! यूक्रेन के आम नागरिक तब तक लड़ेंगे जब तक या तो यूक्रेन से रूस बाहर नहीं हो जाता या यूक्रेन के लोग खुद ही हार नहीं मान लेंगे ।
यह स्थिति बिल्कुल उसी समय की याद दिलाती है जब यूएसएसआर यानी सोवियत संघ अफगानिस्तान में घुस गया था । वहां भी अमेरिका सीधे तौर पर सोवियत संघ से ना टकराकर वहां के लोगों की बाहर से मदद कर रहा था जिसने तालिबान जैसे संगठन को जन्म दिया और एक लंबी लड़ाई के बाद तालिबान ने सोवियत की विशाल सेना को अफगानिस्तान से जाने पर मजबूर कर दिया ।
लेकिन पीछे रह गया आदिम युग का अफगानिस्तान जो आज भी एक खंडहर देश है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति ने जब लोगों को हथियार देने और आम नागरिकों को सेना के साथ लड़ने का आवाहन किया तो यह बात स्पष्ट हो गई थी यह जंग अब एक नया मोड़ ले रही है और पारंपरिक युद्ध की बात पीछे छूट चुकी है।
वियतनाम अफगानिस्तान जैसे युद्ध और इनका इतिहास हमको यही सिखाता है कि हमलावर देश यदि दुश्मन की धरती पर ज्यादा दिन टिकता है और पारंपरिक युद्ध गोरिल्ला वार में कन्वर्ट होता है तो हमलावर देश को कालांतर में लंबा नुकसान उठाना पड़ सकता है बाकी युद्ध का नतीजा चाहे जो भी निकले युद्ध के दुष परिणाम तो आम जनता को ही भुगतने पड़ते हैं।
हालांकि रूस ने जो भी किया वह अपने हितों की रक्षा के लिए किया शुरू से अगर आप रूस की शर्ते देखें तो उसकी यूक्रेन से कोई सीधी लड़ाई नहीं थी रूस बार-बार इस बात पर आपत्ति जता रहा था की अमेरिका बार-बार उसके सहयोगी देशों को नाटो में शामिल कर उसकी सीमा से सटे देशों में अपने मिलिट्री बेस तैयार कर रहा है। युक्रेन और रूस इतने घनिष्ट मित्र थे की रूस और युक्रेन दो देश एक लेकिन एक आत्मा समझे जाते थे .