Anmol Pachauri :26 जून 2025
दुनिया के सबसे खतरनाक और अडवांस्ड स्टेल्थ बमवर्षक विमानों में गिना जाने वाला B-2 Spirit Bomber अमेरिका की सैन्य ताकत का प्रतीक है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके डिज़ाइन और विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्ति एक भारतीय मूल का वैज्ञानिक था -नोशीर गौडिया जैसे नाम उस सूची में शामिल हैं जिनके शोध और तकनीकी योगदान ने अमेरिका के रक्षा क्षेत्र को नई ऊँचाइयाँ दीं।
यह गर्व की बात है कि भारत की धरती पर जन्मा कोई वैज्ञानिक इतने उन्नत प्रोजेक्ट का हिस्सा बना, लेकिन साथ ही यह एक चिंता का विषय भी है—क्योंकि वह प्रतिभा, वह कौशल, वह ज्ञान जो भारत की सेवा कर सकता था, अब किसी दूसरे देश की सामरिक शक्ति बढ़ा रहा है।
चीन समेत कई देशों ने उठाया फायदा
हालांकि वैज्ञानिक नोशिर गोवाडिया ने अमेरिका की नामी डिफेंस कंपनी Northrop Corporation (जिसने B-2 Stealth Bomber बनाया) से नाता तोड़कर फ्रीलांसिंग शुरू कर दी थी, लेकिन 2005 में उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने B-2 बॉम्बर के डिज़ाइन पर आधारित स्टेल्थ तकनीक को चीन को विकसित करने में मदद दी। इसका नतीजा हमें चीन के Xian H-20 बॉम्बर में देखने को मिलता है, जो दिखने में लगभग हूबहू B-2 जैसा है। यही नहीं, इसी तकनीक का इस्तेमाल कर चीन ने J-20 जैसे स्टेल्थ फाइटर विमानों को भी विकसित किया।

दर्दनाक बात ये है कि इसके बदले में चीन ने उन्हें सिर्फ 1 लाख डॉलर की मामूली राशि दी—जो इस उच्च-गोपनीय कार्य के लिए न के बराबर है। कहा जाता है कि उन्होंने ये सब इसलिए किया क्योंकि अमेरिका ने उन्हें वो सम्मान, पदोन्नति और पहचान नहीं दी, जिसके वे हक़दार थे।
अपमानित और उपेक्षित महसूस कर, नोशिर गोवाडिया ने अपनी खुद की कंपनी Stealth Design शुरू की, और इज़राइल, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी जैसे देशों को सेवाएँ दीं। लेकिन चीन ने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया और इस तकनीकी खजाने को एक सुनहरे अवसर के रूप में लपक लिया।
यह कहानी सिर्फ एक वैज्ञानिक की नहीं, बल्कि उस आहत आत्मा की है जिसे उसके अपने देश ने अनदेखा किया, और फिर वो प्रतिभा किसी और के लिए वरदान बन गई।
सम्मान के बदले मिली जेल 32 वर्षो के लिए है जेल में
अमेरिका के घातक स्टेल्थ विमान B-2 बॉम्बर के डिजाइन में अहम भूमिका निभाने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिक को सम्मान के बजाय सज़ा मिली। पिछले 17 वर्षों से वे जेल में बंद हैं, और इस पर दुनिया ने एक तरह की चुप्पी साध ली है। कई विशेषज्ञ और जानकार मानते हैं कि यह सब एक साजिश का हिस्सा था, ताकि B-2 बॉम्बर की तकनीक अमेरिका से बाहर न जा सके। जिस वैज्ञानिक ने एक महाशक्ति के लिए तकनीक रची, उसी को सुरक्षा के नाम पर कैद कर दिया गया। यह घटना न सिर्फ मानवाधिकारों, बल्कि वैज्ञानिक स्वतंत्रता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। हालांकि अमेरिका के यह कदम उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम बताया जाता है।
—
क्यों छोड़ देते हैं वैज्ञानिक अपना देश?
भारत में आज भी सैकड़ों ऐसे प्रतिभाशाली इंजीनियर और वैज्ञानिक हैं जो बेहतर रिसर्च सुविधाएं, अधिक वेतन, सुरक्षित कार्यपर्यावरण और व्यक्तिगत विकास के अवसरों की तलाश में अमेरिका, यूरोप, जापान, या इज़राइल जैसे देशों का रुख करते हैं।
इसके पीछे कुछ मुख्य कारण हैं:
अपर्याप्त रिसर्च फंडिंग और संसाधनों की कमी
राजनीतिक हस्तक्षेप और अफसरशाही
सुरक्षा और स्वतंत्रता की कमी
योग्यता के अनुसार पहचान और सम्मान का अभाव
ऐसे माहौल में देशभक्ति भी हार मान जाती है, और वे वैज्ञानिक जिनकी कल्पनाशक्ति भारत की सीमाओं को सुरक्षित कर सकती थी, किसी और देश के लिए टेक्नोलॉजी बना रहे होते हैं।
—
अगर भारत को वास्तव में वैश्विक महाशक्ति बनना है, तो केवल सैनिकों की नहीं, वैज्ञानिकों की भी रक्षा करनी होगी।
सरकार को रिसर्च एंड डेवलपमेंट में GDP का बड़ा हिस्सा निवेश करना चाहिए।
ISRO, DRDO, BARC जैसी संस्थाओं में कार्यरत वैज्ञानिकों को न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक सुरक्षा भी दी जाए।
युवा वैज्ञानिकों को भारत में ही वह माहौल मिले जिसमें वे बिना किसी डर के अपने विचारों पर काम कर सकें।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से भी यह ज़रूरी है कि भारत के वैज्ञानिक विदेशी एजेंसियों के संपर्क में न आएं, विशेष रूप से उन देशों के जो भारत के रणनीतिक प्रतिद्वंदी हैं।
—
निष्कर्ष: प्रतिभा का पलायन नहीं, सम्मान चाहिए
Dr. A.P.J. Abdul Kalam ने कहा था, “Dreams are not what you see in sleep, dreams are those that don’t let you sleep.” लेकिन अगर हमारे वैज्ञानिकों को भारत में ही सपने पूरे करने का मंच नहीं मिला, तो वे मजबूरन ऐसे मंच पर चले जाएंगे जहां उन्हें सम्मान, संसाधन और सुरक्षा मिले।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम ऐसे वैज्ञानिकों को सिर्फ ‘गर्व’ का विषय न बनाएं, बल्कि उनके लिए ऐसा माहौल बनाएं कि अगला B-2 Bomber भारत में ही बने—भारत के लिए।
