ओडिशा के राज्यपाल के पद से इस्तीफा देने वाले रघुवर दास 10 जनवरी से सक्रिय राजनीति में नई पारी का आगाज करेंगे. इस दिन वह फिर से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता लेंगे. इस मौके पर झारखंड प्रदेश भाजपा कार्यालय में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित होगा, जिसमें प्रदेश के सभी बड़े नेता उपस्थित रहेंगे.

रघुवर दास एकमात्र नेता हैं, जिन्होंने झारखंड के इतिहास में मुख्यमंत्री के रूप में लगातार पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया है. उनकी सक्रिय राजनीति में वापसी से उनके समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है. पार्टी में उनकी नई भूमिका क्या होगी, इसे लेकर सियासी गलियारे में तरह-तरह की चर्चा है.

हाल के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. ऐसे में रघुवर दास की वापसी को भारतीय जनता पार्टी में नेताओं-कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग एक नई उम्मीद के साथ देख रहा है. बुधवार को वह जमशेदपुर स्थित अपने आवास से रांची पहुंचे तो बड़ी संख्या में भाजपा के नेता-कार्यकर्ता उनसे मिलने पहुंचे.

भाजपा में वापसी पर खुद रघुवर दास कहते हैं, ”राजनीति में मेरी भूमिका क्या होगी, यह भारतीय जनता पार्टी तय करेगी. मैं कार्यकर्ता के रूप में खुद को धन्य समझता हूं. 1980 में जब मैंने भाजपा की सदस्यता ली थी, तब भी पार्टी के सामने अपनी कोई अपेक्षा नहीं रखी थी और आज भी खुद को साधारण कार्यकर्ता मानता हूं. मुझे जो भी दायित्व मिलेगा, उसका निर्वाह समर्पण के साथ करूंगा.”

राजनीति में रघुवर दास की नई सक्रिय पारी उस वक्त शुरू हो रही है, जब भाजपा के भीतर राज्य में सशक्त नेतृत्व के विकल्पों पर मंथन चल रहा है. फरवरी महीने में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का नाम तय होना है. कयास लगाया जा रहा है कि प्रदेश नेतृत्व संभालने के लिए रघुवर दास को एक बार फिर से आगे किया जा सकता है. वह पहले भी दो बार झारखंड प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं.

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में भी वह संगठन में सक्रिय रहे हैं. उनकी पहचान राज्य में पार्टी के सबसे बड़े ओबीसी लीडर के तौर पर रही है. एक चर्चा यह भी है कि पार्टी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में बड़ा दायित्व दे सकती है.

रघुवर दास राज्य में चल रहे विधानसभा चुनाव के दौरान ही राज्यपाल पद छोड़कर झारखंड लौटना चाहते थे. उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अपनी इच्छा का इजहार किया था. हालांकि तत्कालीन परिस्थितियों में पार्टी नेतृत्व ने उन्हें पद पर बने रहने को कहा था.

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