बिहार में अधिकारियों पर लगे भ्रष्टाचार, वित्तीय गड़बड़ियों और मनमानेपन के गंभीर मामलों में कार्रवाई की रफ्तार काफी धीमी नजर आती है। वित्तीय नुकसान से लेकर घोटालों और अन्य मामलों में जांच समितियों के गठन में ही महीनों या साल बीत जाते हैं, और लंबी प्रक्रिया के बाद अंततः बहुत हल्की सजाएं दी जाती हैं।

अधिकारियों पर जांच और हल्की सजा के मामले
हालिया मामलों के अनुसार, पटना के तत्कालीन डीटीओ अजय कुमार ठाकुर पर अवैध वाहनों के रजिस्ट्रेशन से राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाने का आरोप था। वर्ष 2021 में शुरू हुई जांच में आरोप सही पाए जाने के पांच साल बाद केवल एक वेतनवृद्धि रोकने की सजा दी गई। इसी तरह, मधेपुरा के तत्कालीन अपर समाहर्ता शिशिर कुमार मिश्र पर खिलाड़ियों से मारपीट के मामले में जांच के बाद केवल दो वेतनवृद्धि पर रोक लगाने की सजा मिली।
घोटालों और गड़बड़ियों में लंबी देरी
बेतिया नगर परिषद के तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी वीरेंद्र कुमार से जुड़ा शौचालय निर्माण में गड़बड़ी का मामला दस साल में पूरा हुआ। वे वर्ष 2014 में गिरफ्तार हुए थे और 2023 में सेवानिवृत्त हो गए, जिसके बाद उनकी पेंशन पर विचार करने का निर्णय लिया गया। वहीं, सीवान नगर परिषद के तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी राजकिशोर लाल पर एलईडी और डस्टबिन घोटाले के आरोप में लगभग चार साल बाद जांच कमेटी बनाई गई।
जांच कमेटियों के गठन में विलंब
पटना के तत्कालीन भूमि उप समाहर्ता मिथिलेश प्रसाद सिंह पर भू-माफियाओं से मिलकर निजी लाभ लेने का आरोप लगा था। जिला कलेक्टर द्वारा कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा के दो महीने बाद जांच टीम का गठन हुआ। इसके अलावा, मुजफ्फरपुर पश्चिमी के तत्कालीन भूमि उप समाहर्ता धीरेंद्र कुमार के खिलाफ लापरवाही के मामले में निलंबन की अनुशंसा पर केवल एक वेतनवृद्धि रोकने की कार्रवाई की गई।
